सोनम वांगचुक ने सुप्रीम कोर्ट से कहा- भाषण हिंसा फैलाने नहीं, रोकने के लिए था

क्लाइमेट एक्टिविस्ट और शिक्षासुधारक सोनम वांगचुक ने नेशनल सिक्योरिटी एक्ट यानी एनएसए के तहत अपनी गिरफ्तारी को ग़लत बताया है।  गिरफ्तारी को चुनौती देने वाली याचिका पर में गुरुवार को सुनवाई के दौरान वांगचुक की पत्नी गीतांजलि अंगमो की तरफ़ से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि अनशन ख़त्म करने वाले उनके भाषण का मक़सद हिंसा फैलाना नहीं, बल्कि उसे रोकना था।

जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस प्रसन्ना वराले की पीठ ने दिन के दूसरे सत्र में पूरे समय तक मामले की सुनवाई की।सिब्बल ने कोर्ट में कहा, ‘भाषण का लहजा किसी भी तरह से हिंसा भड़काने का नहीं था, बल्कि हिंसा शांत करने का था। ये गिरफ्तारी आदेश में लिखी बात के ठीक विपरीत है।’

सिब्बल ने मुख्य तर्क ये दिया कि वांगचुक की गिरफ्तारी के पूरे आधार नहीं बताए गए और उन्हें अधिकारियों के सामने अपनी बात रखने का सही मौक़ा नहीं मिला। उन्होंने कहा कि क़ानून के मुताबिक़, अगर गिरफ्तारी के आधार नहीं दिए जाते तो पूरा आदेश ग़लत हो जाता है। सिब्बल ने पुराने कोर्ट फ़ैसलों का हवाला दिया।

उन्होंने चार वीडियो का ज़िक्र किया और सवाल उठाया कि स्थानीय अधिकारियों की ज़िम्मेदारी थी कि वे सारे तथ्य गिरफ्तारी करने वाले अधिकारी को दें, ताकि फ़ैसला लेने से पहले सब कुछ साफ़ हो। सिब्बल बोले, ‘मुझे मांगने की ज़रूरत नहीं है। ये उनका संवैधानिक कर्तव्य है कि पूरे आधार दें, ताकि मैं अपनी बात रख सकूँ। ग़लती ये नहीं कि उनके पास दस्तावेज नहीं थे, बल्कि ये कि उन्होंने मुझे नहीं दिए।’ कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 12 जनवरी रखी है।

सिब्बल ने दलील दी कि 26 सितंबर 2025 के हिरासत आदेश का आधार मुख्यतः चार वीडियो हैं—दो 10 और 11 सितंबर के, तथा दो 24 सितंबर के। हालांकि, 29 सितंबर को जब हिरासत के आधार दिए गए, तब ये चारों वीडियो हिरासत में रखे गए व्यक्ति को उपलब्ध नहीं कराए गए। उन्होंने कहा कि यह कानून का स्थापित सिद्धांत है कि यदि हिरासत के आधार दिए जाएँ लेकिन उन पर निर्भर दस्तावेज़ न दिए जाएँ, तो यह संविधान के अनुच्छेद 22 का उल्लंघन है। केंद्र सरकार के यह कहने के बावजूद कि सामग्री दी गई थी, सिब्बल ने कहा कि इसका कोई ठोस प्रमाण नहीं दिखाया गया।

सिब्बल ने यह भी बताया कि हिरासत के आधार 28 दिन की गंभीर देरी से दिए गए, जो वैधानिक समयसीमा का स्पष्ट उल्लंघन है। 29 सितंबर को वांगचुक को केवल हिरासत आदेश और अधूरे आधार दिए गए—क्योंकि जिन चार वीडियो पर हिरासत का सबसे निकट और प्रमुख आधार बताया गया, वे उस दिन नहीं दिए गए। उन्होंने कहा कि बाद में जो दिया गया, वह केवल वीडियो के लिंक थे। 5 अक्टूबर को लैपटॉप देने से भी कमी दूर नहीं हुई, क्योंकि 29 सितंबर को दिए गए पेन ड्राइव में ये चार वीडियो थे ही नहीं।

सिब्बल ने अदालत को बताया कि वांगचुक ने हिरासत से कई पत्र लिखकर बताया कि चार वीडियो गायब हैं और उनकी प्रतियाँ माँगीं, लेकिन वे कभी उपलब्ध नहीं कराई गईं। उन्होंने यह भी कहा कि वांगचुक की पत्नी को उन पत्रों की प्रतियाँ देने का आश्वासन दिया गया था, पर एक घंटे से अधिक प्रतीक्षा और उड़ान छूटने के बावजूद दस्तावेज़ नहीं दिए गए।

सिब्बल ने कहा कि अनुच्छेद 22 के तहत प्रभावी प्रतिनिधित्व का अधिकार कोई औपचारिकता नहीं है। दस्तावेज़ दिए जाने और सलाहकार बोर्ड की बैठक के बीच पर्याप्त समय होना चाहिए ताकि हिरासत में रखा गया व्यक्ति उन्हें समझकर तर्कपूर्ण प्रतिनिधित्व कर सके।उन्होंने कहा कि यदि आप सलाहकार बोर्ड से ठीक एक दिन पहले दस्तावेज़ देने की बात करें, तो यह स्वयं कानून का उल्लंघन है।

सिब्बल ने आरोप लगाया कि 24 सितंबर की उस वीडियो सामग्री को—जिसमें वांगचुक ने हिंसा के खिलाफ स्पष्ट बयान दिया—जानबूझकर निरोधक प्राधिकरण के सामने नहीं रखा गया, ताकि हिरासत आदेश बिना वास्तविक घटनाक्रम की जानकारी के पारित हो जाए। उन्होंने कहा कि हितकर सामग्री को दबाना स्वयं में दुर्भावना दर्शाता है और हिरासत आदेश को निरस्त करने का स्वतंत्र आधार बनता है।

सोनम वांगचुक को 26 सितंबर 2025 को एनएसए के तहत गिरफ्तार किया गया था। एनएसए एक सख्त कानून है, जो सरकार को सार्वजनिक व्यवस्था या राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा मानकर किसी को बिना ट्रायल के रोकने की ताक़त देता है। गिरफ्तारी के दो दिन पहले लेह में हिंसक प्रदर्शन हुए थे। लद्दाख को राज्य का दर्जा और संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग को लेकर हुए प्रदर्शन में चार लोग मारे गए और 90 घायल हुए। सरकार ने वांगचुक पर हिंसा भड़काने का आरोप लगाया। बाद में उन्हें जोधपुर जेल में शिफ्ट कर दिया गया।

गीतांजलि अंगमो ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की है कि गिरफ्तारी गैरकानूनी है और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। वे कहती हैं कि वांगचुक ने हिंसा की निंदा की थी और शांतिपूर्ण आंदोलन पर जोर दिया था। ये मामला लद्दाख के लोगों की मांगों और अभिव्यक्ति की आजादी से जुड़ा है।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और कानूनी मामलों के जानकार हैं।)

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